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*हयातुन्नबी सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम*
*पोस्ट 1*
जैसा कि आपको बताया गया कि हयातुन्नबी हम एक सिरिज़ लिख रहे है और इस तरह कि बिलकुल हर हर नुक्ते पर रोशनी डालते हुवे ताकी बात शुरु से समझ आ सके ,,
तो सबसे पहले तो ये जान लिजिये कि तमाम अम्बियाए किराम को अल्लाह दौ जिहते देकर भेजता है एक जिहत ए फज़िलत और दुसरी जिहत ए मिसलियत
जिहत ए मिस्लियत यानी जैसे देखकर ऐसा लगे कि ये अम्बियाए किराम हमारी तरह तो है यानी वो इन्सान ही होते है इन्सानो कि तरह खाते है पिते है निकाह करते है वगैराह वगैराह
लेकिन वो मिसलियत मे भी इन्सान के आले दर्जे पर फाईज़ होते है
जिहत ए फज़लित यानी वो खुसुसियात जो अम्बियाए किराम को आम इन्सानो से जुदा करती है जैसे मासुम होना ,पसिना तो निकलना लेकिन उसमे से खुशबु आना ,सांया ना होना ,और ये फज़िलात इतनी कसिर है इतनी कसिर है कि इनको शुमार नही किया जा सकता
चुंकि जिहत ए फज़िलत आम इन्सानो से अम्बियाए किराम को जुदा रखती है
और जिहत ए मिसलियत अम्बियाए किराम को इन्सानो से मिलाती है
जारी ...
*हयातुन्नबी सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम*
*पोस्ट 2*
जैसा कि पिछली पोस्ट मे बताया कि अम्बियाए किराम को दौ जिहत ए दी जाती है जिहत मिस्लियत व जिहत ए फज़िलत
जैसे कि मिसाल कि तौर पर सागर और नदी बाज़ाहिर एक मिस्ल व समान दिखते है उसमें भी पानी होता है और इसमें भी पानी ही होता है लेकिन जब फज़ाइल में दोनो जुदा जुदा होते है
नदी का फैलाव व गहराई नापी जा सकती है
लेकिन सागर कि वुसअत और गहराई का इहाता नही किया जा सकता
और ऊपर से सागर के फज़ाइल ये कि उसने मोती मुंगा और बहुत से बेश कीमती खज़ानो को अपने अन्दर समेटे हुवे होता है
ठीक इसी तरह बाज़ाहिर ने हुजूर मिस्लियत मे नज़र आते है पैदा होते है इन्सानो कि तरह लेकिन फज़ाइल का आलम ये कि काबा झुकता नज़र आए
किसरा के कंगुरे टूट के गिर जाए
बरसो से जल रहा फारस का आतिश कदा बुझ जाए
सूखी बंजर ज़मिने लहलहाने लग जाए फल सब्ज़ी से।
जानवरो के सूखे थन दूध से भर जाए
चारो तरफ नूर ही नूर छा जाए
तो विलादत मिस्लियत के साथ होते हुवे भी मिस्लियत ना रही
लेकिन मिस्लियत के साथ इसलिये पैदा हुवे ताकी कोई आपको माबूद ना समझ ले
और फज़ाइल के साथ इसलिये विलादत हुवी ताकी कोई आपकी विलादत को आम विलादत ना समझ ले
*इन्शाअल्लाह जारी है*.........
*हयातुन्नबी सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम*
*पोस्ट 3*
हुजुर नबी ए करीम सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम कि विलादत मिस्लियत के पैकर में होकर भी यानी इन्सानो के जैसे विलादत होकर भी जुदा रही ठीक इसी तरह आपकी ज़िन्दगी का एक एक लम्हा ए हयात मिस्लियत के पैकर में रहकर भी आम इन्सानो की ज़िन्दगी से जुदा रही
आप खाना तनावुल फरमाए तो ऐसा लगे कि इन्सानो कि तरह ही तो खा रहे है लेकिन जुदागाना अन्दाज़ फज़ाइल में ऐसा कि खाना आपसे बात करे
आप चले तो मिस्लियत के पैकर मे लेकिन आम इन्सान के चलने में इम्तियाज़ ऐसा कि आपके लिये पत्थर नर्म हो जाए साया नज़र ना आए
ऐसे बहुत से फज़ाइल आम इन्सानो से हुजुर अलैहीस्सलाम को जुदा करते है हत्ता कि हर हर लम्हा ए हयात आपकी मिस्लियत के पैकर मे होकर भी जुदा रही
तो मौत फिर किस तरह आम इन्सानो कि तरह आ सकती थी ?
हमारी मौत आए तो बिना इजाज़त आए और हुजुर अलैहीस्सलाम को आए तो हुजुर अलैहीस्सलाम फरमाए कि एक बन्दे को इख्तियार दिया गया है वो आखिरत को पंसद फरमाए या दुनिया को तो उस बन्दे ने आखिरत को पसंद फरमा लिया ये सुनकर हजरत अबु बक्र सिद्दीक रज़ियल्लाहु अन्हु रोने लगे सहाबा किराम ने उनसे रोने कि वजह पूछी तो आपने फरमाया जिसे मौत पर इख्तेयार वो कोई और नही हमारे आका है
जारी .........
*हयातुन्नबी सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम*
*पोस्ट 4*
जैसा कि पिछली पोस्टो में बताया गया कि तमाम नबीयोथ को दौ जिहतो में भेजा जाता है जिहते फज़िलत और जिहते मिस्लियत
जिहते मिस्लियत देखकर ऐसा लगता है कि ये नबी इन्सानो कि तरह ही तो जिते है इन्सानो कि तरह ही तो खाते है पिते है निकाह करते है चलते है उठते है बैठते है यहा तक कि जो नबीयो को एक पल के लिये मौत आई जो दस्तुर ए खुदावन्दी के तहत और तौहीद कि हिफ़ाज़त कि खातिर आई थी उस मौत को भी जाहीलो ने आम इन्सानो कि तरह मौत आना समझ लिया
ये मुगालता उन जाहीलो को इसलिये हुवा क्योकि उन्होने नबीयो कि सिर्फ जिहत ए मिस्लियत देखी
और जिहत ए फज़िलत पर नज़रे चुरा कर गये जिस तरह कुफ्फारे मक्का चुरा गये और कहने लगे थे 👇👇
مَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا
यानी - तुम तो हमारी तरह बशर हो (सुराह शोअरा आयत 154 )
लेकिन जिनकी आँखो ने जिहत ए फज़िलत भी देखी वो कहने लगे 👇👇
فَلَمَّا رَأَيْنَهُ أَكْبَرْنَهُ وَقَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ وَقُلْنَ حَاشَ لِلَّهِ مَا هَذَا بَشَرًا إِنْ هَذَا إِلَّا مَلَكٌ كَرِيمٌ
यानी - और जब औरतो ने युसुफ को देखा तो बङाई बोलने लगी और अपने हाथ काटने लगी और बोली पाकी है अल्लाह को ये तो हरगिज़ बशर नही मगर कोई इज़्ज़त वाला फरिश्ता (सुराह युसुफ आयत 31)
जारी.........
*हयातुन्नबी सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम*
*पोस्ट 5*
सुस्ती ना करो हयातुन्नबी मे अभी बहुत से बङे ही हैरत नाक बारीकी आएगी तो सुनो ना हुजुर कि ज़िन्दगी आम थी ना हुजूर पर आने वाली अजल आम थी
और ना हुजुर कि अजल के बाद वाली हयात आम है कि तुम्हारे समझ आ जाए
हुजुर अलैहीस्सलाम तो सबसे आला हस्ती है जब आम इन्सान मौत के बाद ज़िन्दा है तो हुजुर कि हयात के क्या कहने कुरान फरमाता है 👇👇
وَكُنْتُمْ أَمْوَاتًا فَأَحْيَاكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
यानी - तुम मुर्दा थे फिर उसने तुम्हे हयात दी फिर तुम्हे मौत देगा और फिर तुम्हे ज़िन्दा करेगा फिर तुम उसकी तरफ पलटाए जाओगे ( सुराह बकराह आयत 28)
*हयातुन्नबी सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम*
*पोस्ट 6*
जैसे कि हमने बताया कि हुजुर सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम पैकरे बशरीयत मे पैदा हुवे लेकिन जिहत ए फज़िलत के साथ विलादत हुवी लिहाज़ा पैकरे बशरीयत मे पैदा हुवे तो ये भी ज़रुरी था कि मौत आए क्योकि हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है ये तो दस्तुर ए खुन्दावन्दी है सिवाए खुदा ए वहादहु लाशरीक के सबको मौत का मज़ा चखना है पस दौ पल के दस्तुर ए रब के तहत मौत आई इसका तो हम इन्कार ही नही करते लेकिन मौत के बाद आपकी रुह वापस आपको लोटा दी गयी और आप हमारे सलाम सुनते भी है और जवाब भी देते है और ये मै नही कह रहा बल्कि खुद नबी ए करीम ने फरमाया देखिये 👇👇
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَوْفٍ ، حَدَّثَنَا الْمُقْرِئُ ، حَدَّثَنَا حَيْوَةُ ، عَنْ أَبِي صَخْرٍ حُمَيْدِ بْنِ زِيَادٍ ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ قُسَيْطٍ ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ، أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : " مَا مِنْ أَحَدٍ يُسَلِّمُ عَلَيَّ ، إِلَّا رَدَّ اللَّهُ عَلَيَّ رُوحِي حَتَّى أَرُدَّ عَلَيْهِ السَّلَامَ
यानी - हजरत अबु हुरेराह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहू अलैह व सल्लम ने फरमाया कि जब भी मुझ पर कोई सलाम भेजता है तो अल्लाह मेरी रुह मुझे लोटा देता है यहा तक के मै उसके सलाम का जवाब देता हु ( सुनन अबु दाऊद जिल्द 2 हदीस 2041)
चुंकी हदीस हुजुर अलैहीस्सलाम ने विसाल से पहले ब्यान फरमाई इसलिये और सिगा ए मुज़ाहीरा इस्तेमाल फरमाकर ये बता दिया कि मेरी रुह लोटा दी जाएगी और मै सलाम सुनता रहुंगा जवाब देता रहुंगा क्योकि हदीस मे सिगा ए मुज़ाहीरा है जो हाल व माझी दौनो के लिये इस्तेमाल होता है
जारी ........
ये हो गयी आम इन्सानो कि मौत के बाद ज़िन्दा होने कि बात जो सुम्मा युहयीयकुम मे आ गयी
फिर कुरान मे शौहदा कि ज़िन्दगी मे बात अल्लाह ने अलग से कि इस तरह 👇👇
وَلَا تَقُولُوا لِمَنْ يُقْتَلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتٌ بَلْ أَحْيَاءٌ وَلَكِنْ لَا تَشْعُرُونَ
यानी - और जो अल्लाह कि राह मे मारे गये उन्हे मुर्दा ना कहो बल्कि वो ज़िन्दा है तुम्हे शाऊर नही ( सुराह बकराह आयत 154 )
तो इस आयत मे शौहदा कि मौत के बाद कि हयात ब्यान करके फरमा दिया कि तुम्हे शाऊर नही तुम समझ ही नही सकते अन्दाज़ा ही नही कर सकते उनकी ज़िन्दगी का
जब तुम्हे शहीद कि ज़िन्दगी का शाऊर नही तो फिर नबीयो कि ज़िन्दगी का शाऊर कैसे हो सकता है ? जबकी शहीद तब ही शहीद बन सकता है जब तक वो रिसालत पर जान कुरबान ना करे तो नबी तो शहीद से भी बुलन्द है अब तुम साबित कर दो नबी कि मौत अल्लाह कि राह में नहीं ?
*जारी है।।*
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